लगभग दो दर्जन हस्तलिखित पांडुलिपियों में लिपिबद्ध इस रामलीला की समस्त विषयवस्तु निहित है।
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धन धन भारत शोभा धाम प्रथम जननी न करू प्रणाम ॥
मुकुट हिमालय सोये शिर पर गंगा यमुना हार चरणन धोवे सिंधु पखार ॥
राम कृष्ण गौतम गाँधी सा होया यहाँ अवतार ॥१॥
गाँधी वीर शुभाष भगत सिंह राज गुरु सुख देव जिन्होंने अपनी जान गुमाई ॥
लाखो हीरा भेंट होया जब या आज़ादी आई ॥२॥
वीर धरा हल्दी घाटी राणा प्रताप सा वीर शत्रुदल तड़प रयो बिन पाणी ॥
ले तलवार लडी दुश्मन सु वा झाँसी की राणी ॥३॥
अलादीन जब चढ़कर आयो करयो पद्मिनी हरण सात सौ सनी पालकी बाकी ॥
धन धन गोरा बादल न माँकी लज्जा राखी ॥४॥
सेवर जेठ विमान अमेरिका छा व पेंटन टैंक तोड़ दिया गाजर मूली जाण ॥
माता हित बलिदान हो गया व भारत का जवान ॥५॥
मोर ध्वज राजा राणी न आरी लिनी हाथ चिर दियो रतन कुवर सो घात ॥
भुखा सिंग ने भोजन दिनो या सब जाण बात ॥६॥
सतवादी हरिश्चंद्र सती सेव्या रोहित ने लेर जभी आया गंगा को तीर ॥
धन धन सतवादी राजा भरयो नीच धर नीर ॥७॥
बूंदी को इतिहास वीर कुम्भा न त्याग दिया प्राण मॉंग ली चूडावत सलाणी ॥
शीश काट सलाणी भेजी वा दी हाड़ी राणी ॥८॥
लक्ष्मी पति की कृपा छत्र न लेकर के उपहार जा गिरया कॉई बात की रवावो ॥
लेकर इ सतसंग मण्डली न राजस्थान आवो ॥९ ॥
|| दोहा ||
श्री गुरु चरण सरोज रज, निज मन मुकुर सुधार
बरनऊं रघुवर बिमल जसु, जो दायकु फल चारि ।
सिया वर राम चंद्र की जय
उमापति महादेव की जय
पवन सूत हनुमान की जय
बोलो रे भाई सब सन्तन की जय
|| चौपाई ||
प्रथम ही तो गणराज मनाऊ ।
मात सरस्वती जी की आज्ञा पाऊ ॥
गुरु चरनन मम शिश नवाऊ ।
राम चंद्र जी का हरि गुण गाऊ ॥
चढ़ाव - नमो गुरु गणपत सारद धाऊ हरि जस रामचंद्र गाउ
नमो गुरु गणपत न ढोकु अष्ट पहर दिन रेन गजानंद रणत भवर महाराज ।
उतार - शिर पर सोहे मोर मुकुट बाक पाँव घुँघरा बाज ।।
नमो सदा शिव शंकर ढोकु गवर पति न महादेव हे नाडे असवार ।
शीश गंग हर गंग विराजे गले शेष फनहार ॥
नमो सारदा ब्रहम सुता न नमन करू प्रणाम ईशरी माजी हंसा रुद ।
मम वाणी तुम सफल करो न मति हमारी मूद ॥
सावित्री जी का पति डोकु आद ब्रहम अवतार सकल का ब्रहमा हे करतार ।
सकल श्रष्टि ब्रहमा न रच दीनी पंथ चलावन हार ॥
नमो हरि भगवान राम न सवरू बारम्बार सदा चरनन म शिश नवाऊ ।
जिनके दूत महा बल योद्धा हनुमत वीर मनाऊ ॥
प्रथम गुरु आद अखाड़ा आर लगादयूं चारों खूंटां कार ॥
प्रथम अखड़ा बीच चोक मं बराज श्री रघुनाथ शम्भु की कर नांक दो चीर ॥
राम र लक्ष्मण भरत शत्रुघन टाढे हनुमत वीर ॥१॥
बावन भेरु चौसठ योगिनी आवो अखड़ा मांही दाव दुश्मन का लगता नांही ॥
जंतर मंतर नजर मुठ या चले किसी की नांही ॥२॥
एक खूंट प दुर्गा बिराज दूजा भवानी माई खूंट तीजां प शारदा माई ॥
ईर अखड़ा मं कर बखड़ो जीन खाव कालक्या माई ॥ ३ ॥
धरती बाँध आकाश बाँधू बाँधू चौदह लोक बाँध कर इनको करूं मजंबूत्त ॥
ईर अखड़ा माहिन नहीं आव डाकन भूत ॥ ४ ॥
अजी सवरूँ लक्ष्मीनाथ अवतार हमारा बेड़ा लगाओ प्रभु पार ॥
लक्ष्मीनाथ का मंदिर ऊपर उगन्ता प्रभात नाथ क पड़ पछेरयाँ ज्वार ॥
मोर मोरड़ी सवा कबूतर पंछी चुग हज़ार ॥१॥
सन्मुख हस्ती घूम बारण दरवाजा क बीच नाथ की कुंज बणी एफ भारी ॥
सारी परजा दर्शन आयी होया गरुड़ असवारी ॥२॥
बागो सोह केसरियाँ प्रभु दुपटो फूल गुलाब जिन्होंक सुन्दर लग रही कोर ॥
लक्ष्मीनाथ का कर्ण पेच मं लाखों रूपया को मोल ॥३॥
काना बीच कुंडल हद खुल जी मोर मुकट सर पेच नाथ की झांकी लगती प्यारी ॥
राम नवमी को जनम उछव छ दशमी की असवारी ॥४॥
बड़ा बाग मं गजानंद छ गढ़ मं बिहारी नाथ शहर मं लक्ष्मीनाथ की झांकी ॥
घर छ साढ़ा तीन सौ ब्रह्मपुरी छ बांकी ॥५॥
लक्ष्मीनाथ का चोक बीच मं बजता ताल मृदंग नाथ की गहरी होव सत्संग ॥
लक्ष्मीनाथ की महर सु ध्वजा उड़ पचरंग ॥६॥